सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, स्थायी कमीशन से वंचित महिला अधिकारियों को मिलेगा पेंशन का अधिकार

RAIPUR KI BAAT
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 नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंगलवार को कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना की वे महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारी, जिन्हें मनमाने मूल्यांकन के कारण स्थायी कमीशन (PC) नहीं दिया गया, वे पूर्ण पेंशन संबंधी लाभ पाने की हकदार हैं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि इन अधिकारियों को पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी करने वाला ‘माना जाएगा’, भले ही उन्हें इससे पहले सेवा से मुक्त कर दिया गया हो। यह फैसला कई याचिकाओं पर आया, जिनमें विंग कमांडर सुचेता एदान और अन्य द्वारा दायर याचिकाएं शामिल थीं, जिन्होंने 2019 की नीतिगत बदलावों और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के पूर्व फैसलों के आधार पर स्थायी कमीशन से वंचित किए जाने को चुनौती दी थी।

चीफ जस्टिस ने कहा कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACRs) अक्सर इस धारणा के साथ ‘लापरवाही से’ लिखी जाती थीं कि उन्हें करियर उन्नति या स्थायी कमीशन नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा, ‘एसीआर इस अनुमान के साथ लिखे गए कि उन्हें करियर में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलेगा। इससे उनकी समग्र योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।’

पीठ ने वायुसेना, नौसेना और सेना की महिला एसएससी अधिकारियों को स्थायी कमीशन न दिए जाने के मामलों पर अलग-अलग विचार किया। वायुसेना के संदर्भ में, पीठ ने पाया कि 2019 में लागू किए गए ‘सेवा अवधि मानदंड’ और ‘न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड’ जल्दबाजी में लागू किए गए, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित अवसर नहीं मिला।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए, जो पूर्ण न्याय करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को कोई भी आदेश देने का अधिकार देता है, पीठ ने कहा कि एक बार के उपाय के रूप में 2019, 2020 और 2021 में आयोजित चयन बोर्डों में स्थायी कमीशन के लिए विचार किए गए सभी एसएससी अधिकारी, जिनमें 2021 में सेवा से मुक्त किए गए अधिकारी भी शामिल हैं, को 20 वर्ष की पात्र सेवा पूरी करने वाला माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि पेंशन इसी 20 वर्ष की काल्पनिक (deemed) सेवा के आधार पर तय की जाएगी, जो 1 नवंबर 2025 से प्रभावी होगी। हालांकि, अदालत ने ‘संचालनात्मक प्रभावशीलता’ का हवाला देते हुए पुनर्नियुक्ति का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन यह भी कहा कि यह वित्तीय लाभ देने से इंकार करने का आधार नहीं हो सकता।

सेना और नौसेना से संबंधित मामलों पर विचार करते हुए, अदालत ने उनके मूल्यांकन प्रणाली में भी समान कमियां पाईं और कहा कि मूल्यांकन मानदंडों को उजागर न करने से इन अधिकारियों को नुकसान हुआ।

अदालत ने सेवा में नहीं रहने वाले अधिकारियों को विंग कमांडर के पद पर काल्पनिक समय-मान (notional time-scale) पदोन्नति देने की मांग को खारिज कर दिया। इससे पहले, केंद्र सरकार ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा था कि सेना की प्रक्रियाएं जेंडर न्यूट्रल (gender-neutral) हैं और बलों को युवा बनाए रखने के लिए चयन से बाहर करना नीति का हिस्सा है।

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